MEN OF BURDEN

खींचते रिक्शा लपेटे राह पैरो में 
आ पड़ी है हर मनुज की चाह पैरों में 
हम भुजाओं में धरा के अश्र भर लेंगे 
हम श्रमिक श्रम से धरा को धन्य कर देंगे 

इंसान का बोझ ढोने वाले इंसानो के बदन अब कमज़ोर पड़ रहे। भारत में गरीबो के हालात तकलीफ देह हैं , उन्ही में से कुछ रिक्शा चालक भी हैं।  तेज़ी से भागती हुई ज़िन्दगी में रिक्शावालों की रफ़्तार धीमी पड़ती जा रही है। इ - रिक्शा के आने के बाद अब तो इनकी आमदनी ना के बराबर हो गई है।  ना तो ज़रा भी पढ़े लिखे हैं की कोई और काम कर ले और बाकी वाहन इतने इफ़राद हैं की उनको लेकर भी कमाई में कोई ख़ास फर्क नहीं आ पाएगा। धीरे धीरे काम ख़त्म होने का डर भी है पर उम्मीद भी। सालों से रास्ते तय किये है फिर भी मंज़िल नज़र नहीं आ रही है। https://youtu.be/s4oie-wupWI

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