रात ने फ़िर...

रात ने फिर याद की खिड़की खोल दी 
बंध गए थे जो ख्वाब उनकी गिरह खोल दी।

चल पड़े फिर बेख्याली में
रास्तों ने फिर मंजिल छोड़ दी।

घुल रही है यादों की खुश्बु इस कदर
जैसे इत्र की शीशी तोड़ दी।

देखा जो फिर हथेली की ओर 
लकीरों ने उम्मीद तोड़ दी।

नीदें भी अब ख्वाबों की जिंद नही करती
आंखो ने ये बुरी आदत छोड़ दी
रात ने फिर याद की खिड़की खोल दी।

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