ढहती दीवार
आज फिर , देर रात
बीत गयी है
थी दिमाग भी
सोने की हिदायत
दे रहा था
और उँगलियाँ भी
स्क्रॉल करके थक
गयीं है। करवट
बदल कर देखा
तो नानी सोई
हुई थी गहरी
नींद में , आज
कल बड़ी
मुश्किल से नींद
आती है उन्हें।
मैं एक टक
उनकी आँखों को
देखती रही, ज़िन्दगी
के लम्बे सफर
की थकन आँखों
में उतर आयी
थी। उम्र के
इस पड़ाव पर
जो खोया उसकी
फेहरिस्त लम्बी है और
जो पाया उसका
हिसाब नहीं मिलता,
अब काँपतें हाथ
बस सहारे
की उम्मीद करते
हैं फिर चाहे
वो कोई भी
हो। जिस्म मज़बूर
कर देता है
इंसान को , पर
सोचने वाली बात
है जो हाथ
नन्ही उँगलियाँ थाम
कर चलना सिखाते
हैं , लड़खड़ाने पर
सँभालते हैं , वो क्यों
इस कदर बेबस
हो जाते हैं।
भारत में बुज़ुर्ग
यानी 60 साल से
ज़्यादा उम्र की
लगभग आधी आबादी
रिश्तेदारों के शारीरिक
और मानसिक उत्पीड़न
की शिकार है। सामाजिक
संस्था हेल्पएज इंडिया के
सर्वे के मुताबिक
देश के 12 महानगरों
में 1200 से ज़्यादा
बुज़ुर्गो से बात
चीत की गयी
इन में से
लगभग आधे लोगों
ने कहा की
वो अपने ही
घर में बेगाने
हैं उनको लगभग
रोज़ाना किसी न
किसी रूप का
अत्याचार सहना पड़ता
है। 2013 में ऐसे
लोगों की तादाद
महज 23 फीसदी थी यानी
एक साल में
उत्पीड़न के शिकार
बुज़ुर्गों की तादाद
दोगुनी से ज़्यादा
बढ़ी है। फ़िलहाल
भारत में ऐसे
लोगों की आबादी
10 करोड़ है और
अनुमान है की
2050 तक यह बढ़
कर 32 करोड़ हो
जायेगा। अधिकतर बुजुर्ग डिप्रेशन,
आर्थराइटिस, डायबिटीज एवं आंख
संबंधी बीमारियों से ग्रस्त
हैं और महीने
में औसतन 11 दिन
बीमार रहते हैं।
सबसे ज्यादा परेशानी
उन बुजुर्गों को
होती है, जिनके
पास आय का
कोई स्रोत नहीं
है। हेल्पेज इंडिया
द्वारा जारी एक
रिपोर्ट बताती है कि
देश के लगभग
10 करोड़ बुजुर्गों में से
पांच करोड़ से
भी ज्यादा बुजुर्ग
आए दिन भूखे
पेट सोते हैं।
देश की कुल
आबादी का आठ
फीसदी हिस्सा अपने
जीवन की अंतिम
वेला में सिर्फ
भूख नहीं, बल्कि
कई तरह की
समस्याओं का शिकार
है। रिपोर्ट बताती
है कि बुजुर्गों
को राज्य सरकारों
की ओर से
जो पेंशन दी
जा रही है,
वह इतनी नाकाफी
है कि उससे
महीना भर तो
क्या, चार दिन
भी बसर हो
सकना असंभव है
वक़्त का तकाज़ा
है की अब
पेड़ लगाने वाला
धूप में बैठा
रहता है, वो
इज़्ज़त जो बरसो
में कमाई है
अब मांगने पर
भी नहीं मिलती।
चाहत भी है
तो बस थोड़े समय
और प्यार की
, वही जो कभी
बेहिसाब दिया था।
इस पर निदा
फ़ाज़ली के वो
लफ्ज़ याद आते
हैं -" वक़्त-ए
-पीरीं दोस्तों की बेरुखी
का क्या गिला
बच
के चलते हैं
सभी ढहती हुई
दीवार से। "
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